आध्यात्मिक साधनाएँ
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आध्यात्मिक साधनाओं के बारेमें स्वामीजी ने अपने सरल और सुमधुर वाणी में जो सत्संग दिये हैं, उनको एकत्रित करके संक्षिप्त स्वरुप में आप तक लाने की यह कोशिश है
- Language
- Hindi
- Publisher
- Anand Niketan Trust
- Pages
- 140
- ISBN-13
- 9788196984144
- ISBN-10
- 9788196984144
- Weight
- 450.00 Gms
- Dimensions
- 18.5 × 13.5 × 1 CM
About this book
आध्यात्मिक साधना की प्रक्रियाओं को समझाते हुए स्वामीजी कहते हैं, ज्ञान पाने के लिए आपकी इच्छा ही सबसे महान शक्ति है| जब तक आप द्वार नहीं खोलेंगे, प्रकाश अंदर नहीं आयेगा| प्रभु ने सब कुछ दिया है, कमियाँ अगर हैं, वह आप में हैं| अगर आपकी प्रबल इच्छा हो, तो परमात्मा ज़रूर सहायता करेगा| अगर आतंरिक इच्छा से अभ्यास करो, साधना करो, तो संसार में कुछ भी असंभव नहीं| आपकी बहुत सारी शक्ति फिज़ूल इच्छाओं में व्यर्थ जाती है| वैराग्य याने इन फिज़ूल इच्छाओं का त्याग करना| गुरुदेव आगे समझाते हैं - जो एकाग्र चित्त होता है, वही सिद्धि प्राप्त करता है; और जब तक पूर्ण इच्छाशक्ति नहीं होगी, एकाग्रता नहीं आयेगी| स्वामीजी पूछते हैं, संसार की बातों में कैसे मन जुट जाता है? क्यों कि वहाँ हमारी इच्छा है| दोष आपका ही है| करनेवाले को सब संभव है| जब लगन लगेगी तो आंतरिक शक्ति खुलेगी| अभ्यास, साधना करते रहो, एक ना एक दिन लाभ मिलेगा| 'क्या बूढ़ा शरीर आध्यात्मिक साधनायें कर सकता है ?' गुरुदेव इसका भी उत्तर देते हैं - शरीर बूढ़ा हो जाता है, जब आप की प्राणशक्ति कम हो जाती है| उसका आपकी आयु से कोई संबंध नहीं| च्यवन जैसे महान ऋषि ने अपनी आध्यात्मिक साधना अस्सी बरस की आयु में शुरू की| गुरुदेव आगे कहते हैं, आध्यात्मिक साधना में अहं को छोड़ना पड़ता है| अहं ही प्राणशक्ति का विनाश करता है| हमारी कमज़ोरी का कारण अहं ही है| अहं अपने को बचाने के लिए शंका करता है| शंका रोग है; वह आपको आध्यात्म मार्ग पर आगे बढ़ने नहीं देगी| शंका कमज़ोरी लाती है, तो श्रद्धा शक्ति| आध्यात्मिक साधना में श्रद्धा अनिवार्य है| श्रद्धावान लभते ज्ञानं|